Friday, February 6, 2026
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Korean Game Addiction: कोरियन संस्कृति का बढ़ता प्रभाव, बच्चों की मानसिक सेहत पर खतरा, अभिभावक चिंतित

देहरादून/गाजियाबाद।
कोरियन संस्कृति की चमक भारतीय किशोरों और युवाओं को तेजी से आकर्षित कर रही है, लेकिन इसके साथ इसके दुष्परिणाम भी सामने आने लगे हैं। हाल ही में गाजियाबाद से सामने आई एक दुखद घटना ने इस प्रवृत्ति को गंभीर बहस का विषय बना दिया है। इस घटना के बाद अभिभावकों की चिंता और गहरी हो गई है कि कहीं बच्चों की मानसिक सेहत इस बढ़ते डिजिटल और सांस्कृतिक प्रभाव की भेंट न चढ़ जाए।

राजकीय दून मेडिकल कॉलेज चिकित्सालय की वरिष्ठ मनोरोग विशेषज्ञ डॉ. जया नवानी के अनुसार, भारत में कोरियन संस्कृति—खासतौर पर कोरियन सीरियल, बॉय बैंड और ऑनलाइन गेम—का प्रभाव तेजी से बढ़ रहा है। उन्होंने बताया कि देहरादून में ही पिछले कुछ समय के दौरान करीब पांच ऐसे मामले सामने आए हैं, जिनमें किशोर और युवा मानसिक विकृति के लक्षणों के साथ परामर्श के लिए पहुंचे।

डॉ. नवानी के मुताबिक, कुछ किशोरियां कोरियन संस्कृति से इस कदर प्रभावित हो रही हैं कि वे अपने अभिभावकों से भारत छोड़ने तक की जिद करने लगी हैं। उन्होंने दो मामलों का उल्लेख करते हुए बताया कि एक किशोरी कोरियन बॉय बैंड बीटीएस से जुड़े कैंप के लिए कोरिया जाना चाहती थी, जबकि एक अन्य युवती ने बताया कि कोरियन धारावाहिक देखने के बाद उसके मन में भारतीय मूल के लड़कों के प्रति नकारात्मक भाव पैदा होने लगे हैं और वह केवल कोरियन मूल के युवक से विवाह करना चाहती है। इन दोनों मामलों में अभिभावक उनकी ओपीडी तक पहुंचे थे।

इसी बीच, गाजियाबाद में कोरियन-लवर गेम से जुड़ी तीन बहनों द्वारा एक साथ आत्मघाती कदम उठाने की घटना ने स्थिति की गंभीरता को और उजागर कर दिया है। विशेषज्ञों का मानना है कि किशोरों में मोबाइल फोन का अत्यधिक उपयोग और लगातार डिजिटल कंटेंट देखना इसकी बड़ी वजह है। लंबे समय तक एक ही तरह की सामग्री देखने से मस्तिष्क में डोपामाइन का स्तर बढ़ता है, जो धीरे-धीरे लत में बदल जाता है।

ब्रेन का ‘ब्रेक सिस्टम’ कमजोर

एम्स ऋषिकेश के मनोरोग विभाग के अध्यक्ष डॉ. रवि गुप्ता का कहना है कि कम नींद और अत्यधिक स्क्रीन टाइम मस्तिष्क के प्रीफ्रंटल कॉर्टेक्स को प्रभावित कर रहा है। यही हिस्सा सही-गलत का निर्णय लेने और गलत कदमों से रोकने का काम करता है। जब यह तंत्र कमजोर पड़ता है, तो व्यक्ति आवेग में फैसले लेने लगता है।
उन्होंने बताया कि एम्स की ओपीडी में हर सप्ताह चार से पांच ऐसे मरीज पहुंच रहे हैं, जिन्हें इंपल्सिव डिसऑर्डर के रूप में पहचाना जा रहा है। ऑनलाइन गेमिंग और डिजिटल कंटेंट की लत इसके प्रमुख कारणों में शामिल है।

अभिभावकों के लिए जरूरी संकेत

  • बच्चे अत्यधिक समय लेने वाले या टास्क-आधारित गेम तो नहीं खेल रहे

  • सोशल मीडिया या गेमिंग प्रोफाइल में विदेशी भाषा के नामों का बढ़ता प्रयोग

  • परिवार, दोस्तों या भाई-बहनों से दूरी

  • विदेशी भाषा और संस्कृति के प्रति असामान्य लगाव

  • पहनावे, खान-पान और व्यवहार में अचानक बदलाव

विशेषज्ञों का कहना है कि समय रहते संवाद, स्क्रीन टाइम की सीमा तय करना और जरूरत पड़ने पर मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ से परामर्श ही बच्चों को इस बढ़ते खतरे से बचाने का सबसे प्रभावी तरीका है।

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