संजय थपलियल उत्तराखंड वासियों और निहंगों के बीच विवाद अब थम जाना चाहिए। ये कलह दो प्रदेशों के बीच घमासान की ओर बढ़ रही है। किसको फायदा किसको नुकसान प्रश्न ये नहीं। प्रश्न देश की अखंडता का है। दोनों गुटों को संयम बरतना चाहिए। और अपनी अपनी ओर से सबकुछ भुलाकर, भाईचारा कायम करना चाहिए। वहीं दोनों प्रदेश की सरकारों को भी अपने स्तर पर इस ओर पहल करनी चाहिए। सोचिये, ये विवाद यूं ही बढ़ता रहा तो क्या देश कमजोर नहीं होगा। बाहरी ताकतें जो घात लगाए मौके की तलाश में बैठी हैं, क्या हम उन्हें खुला आमंत्रण नहीं दे रहे। कि आओ.. । इतिहास गवाह है, आपसी लड़ाई हमेशा दुश्मन का पाला मजबूत करती है। देश पहले ही बहुत सारी चुनौतियों का सामना कर रहा है। चाइना, पाकिस्तान, बांग्लादेश ही नहीं नेपाल तक हमारे देश की बर्बादी के सपने देख रहा है। अमेरिका नीचा दिखाने में कुछ कसर नहीं छोड़ रहा। ऐसे में दो प्रदेश अपने एहंकार की लड़ाई लड़कर क्या हाशिल कर लेंगे। इस वक्त देश को एक होने की जरूरत है, नाकि अपने एहंकार और वर्चस्व की ताल ठोकने की। ये मौका भारतीय बनने का है, नाकि पंजाबी, निहंग, उत्तराखण्डी, गढ़वाली या अन्य अन्य होने का। हम सब पहले भारतीय हैं, तब किसी प्रांत प्रदेश के। जो कुछ भी पिछले दिनों घटनाक्रम हुए हैं, उसके लिए दोनों पक्षों को सामने आकर गलतियों पर खेद प्रकट करना चाहिए। गले मिलकर देश में अमन चैन कायम करने की ओर बढ़ना चाहिए। क्षमा और माफी मांगना ईश्वर की इबादत होती है। इससे कद छोटा नहीं बल्कि बड़ा होता है। दोनों पक्षों से शांति की अपील करता हूं। दोनों ही प्रदेश अपनी महान गाथाओं के लिए विश्व विख्यात हैं। देश की प्रगति और सुरक्षा के लिए दोनों का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। देश की सेना में दोनों प्रदेश के बहादुर जवानों ने बलिदान दिया है, दे रहे हैं। होनहार युवा देश की तरक्की में अहम योगदान दे रहे हैं। वो देश के दुश्मनों से लड़ रहे हैं, देश की तरक्की के लिए जी जान लगा रहे हैं। और हम अपने ईगो को लेकर तलवारें खींच रहे हैं। ये कैसा एहंकार है? लेख में कुछ कटुता भी है, किसी को ठेस पहुंची हो, उसके लिए खेद प्रकट करता हूं। मेरा मकसद किसी को ठेस पहुंचाना नहीं है। ऐसे हालात देखकर मन दुखी है। किसकी नजर लग गई, मेरी देवभूमि और मेरे देश को।
ये कैसा एहंकार, कैसा वर्चस्व, किसकी नजर लगी देवभूमि को
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