Monday, November 2, 2026
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SC-ST Reservation: एससी-एसटी आरक्षण में क्रीमीलेयर लागू करने की मांग पर सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र और राज्यों से मांगा जवाब

नई दिल्ली।
अनुसूचित जाति (एससी) और अनुसूचित जनजाति (एसटी) के लिए लागू आरक्षण व्यवस्था में क्रीमीलेयर सिद्धांत को शामिल करने की मांग को लेकर दायर जनहित याचिका (PIL) पर सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार सहित सभी राज्य सरकारों को नोटिस जारी कर जवाब तलब किया है। यह याचिका संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत दाखिल की गई है, जिसमें आरक्षण नीति में सुधार और पुनर्समीक्षा की मांग उठाई गई है।

मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की पीठ के समक्ष हुई सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता एवं अधिवक्ता अश्विनी कुमार उपाध्याय ने दलील दी कि यदि किसी एससी या एसटी परिवार का सदस्य पहले से किसी संवैधानिक पद या वरिष्ठ सरकारी पद पर आसीन है, तो उसके बच्चों को आरक्षण का लाभ नहीं मिलना चाहिए। उनका तर्क था कि सामाजिक और आर्थिक रूप से उन्नत परिवारों को लगातार आरक्षण का लाभ देना सकारात्मक कार्रवाई के मूल उद्देश्य के विपरीत है।

आरक्षण के उद्देश्य पर उठे सवाल

याचिकाकर्ता ने कहा कि आरक्षण का मकसद समाज के सबसे पिछड़े, वंचित और शोषित वर्गों को मुख्यधारा में लाना है। लेकिन वर्तमान व्यवस्था में एससी-एसटी वर्गों के भीतर उभरे एक सीमित अभिजात वर्ग को बार-बार इसका लाभ मिल रहा है, जिससे वास्तविक जरूरतमंद लोग पीछे छूट जाते हैं।

याचिका में क्या कहा गया

याचिका में उल्लेख किया गया है कि आरक्षण को शुरू में एक अस्थायी और सुधारात्मक कदम के रूप में अपनाया गया था। समय के साथ कई परिवारों ने सामाजिक प्रगति और आर्थिक स्थिरता हासिल कर ली है, इसके बावजूद वे पीढ़ी-दर-पीढ़ी आरक्षण का लाभ लेते आ रहे हैं। इससे समुदाय के भीतर असमानता और गहरी हो रही है।

संविधान सभा की बहसों का हवाला

याचिका में संविधान सभा की बहसों का हवाला देते हुए कहा गया है कि आरक्षण को कभी भी वंशानुगत अधिकार के रूप में लागू करने की मंशा नहीं थी। इसमें डॉ. भीमराव आंबेडकर सहित अन्य संविधान निर्माताओं के विचारों का उल्लेख करते हुए कहा गया है कि सकारात्मक कार्रवाई को समय और परिस्थितियों के अनुसार गतिशील रूप से लागू किया जाना चाहिए।

आगे की कार्रवाई

सुप्रीम कोर्ट द्वारा केंद्र और राज्यों से जवाब मांगे जाने के बाद अब सरकारों के रुख पर सबकी नजरें टिकी हैं। यह मामला देश में आरक्षण नीति और सामाजिक न्याय को लेकर नई बहस को जन्म दे सकता है।

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