देहरादून। उत्तराखंड में निराश्रित गोवंश के संरक्षण और देखभाल के उद्देश्य से वर्ष 2010 में बड़े स्तर पर गठित किए गए उत्तराखंड गो सेवा आयोग को स्थापना के 16 वर्ष बाद भी पूर्ण प्रशासनिक ढांचा नहीं मिल पाया है। आयोग आज भी संसाधनों और कर्मचारियों की भारी कमी से जूझ रहा है, जिसके चलते कई महत्वपूर्ण कार्य प्रभावित हो रहे हैं।
स्थिति यह है कि आयोग के पास अपना स्थायी स्टाफ तक उपलब्ध नहीं है और उसे पशुधन विभाग के कर्मचारियों के सहारे ही कामकाज चलाना पड़ रहा है। आयोग का सांगठनिक ढांचा तय करने के लिए शासन को प्रस्ताव भेजा जा चुका है, लेकिन अब तक इस दिशा में कोई ठोस कार्रवाई नहीं हो सकी है।
आयोग से जुड़े अधिकारियों का कहना है कि पर्याप्त कर्मचारियों और संसाधनों की कमी के बावजूद आयोग अपनी जिम्मेदारियों को निभाने का लगातार प्रयास कर रहा है। राज्यभर में निराश्रित गोवंश को आश्रय उपलब्ध कराने, उनके भोजन की व्यवस्था करने और बीमारी अथवा दुर्घटना की स्थिति में उपचार कराने का कार्य आयोग की निगरानी में किया जा रहा है।
प्रदेश में वर्तमान समय में पंजीकृत 95 गौसदनों में लगभग 17,500 निराश्रित गोवंश का पालन-पोषण किया जा रहा है। इन गौसदनों को सरकार की ओर से प्रति गोवंश 80 रुपये प्रतिदिन की दर से भुगतान किया जा रहा है। हालांकि, आयोग के सीमित संसाधनों के कारण निगरानी और व्यवस्थाओं को प्रभावी ढंग से संचालित करने में कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि आयोग को मजबूत प्रशासनिक ढांचा और पर्याप्त स्टाफ उपलब्ध कराया जाए तो राज्य में निराश्रित गोवंश के संरक्षण और प्रबंधन की व्यवस्था और अधिक प्रभावी हो सकती है। वहीं, शासन स्तर पर लंबे समय से लंबित प्रस्ताव पर कार्रवाई नहीं होने से आयोग की कार्यप्रणाली पर सवाल भी उठने लगे हैं।