Saturday, October 24, 2026
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Uttarakhand High Court News: 13 साल जेल में रहने के बाद हत्या का दोषी नाबालिग घोषित, तत्काल रिहाई के आदेश

नैनीताल। उत्तराखंड हाईकोर्ट ने जुवेनाइल जस्टिस एक्ट के तहत एक अहम फैसला सुनाते हुए हत्या के मामले में 13 साल से जेल में बंद एक कैदी को नाबालिग घोषित कर उसकी तत्काल रिहाई के आदेश दिए हैं। अदालत ने माना कि जिस समय यह वारदात हुई थी, उस वक्त आरोपी की उम्र 18 वर्ष से कम थी, इसलिए उसे दी गई आजीवन कारावास की सजा कानून के अनुरूप नहीं थी।

यह निर्णय न्यायमूर्ति रवींद्र मैठाणी और न्यायमूर्ति आशीष नैथानी की खंडपीठ ने दिया। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जुवेनाइल जस्टिस एक्ट के अंतर्गत नाबालिग होने का दावा किसी भी चरण में, यहां तक कि सजा की पुष्टि और लंबे समय तक जेल में रहने के बाद भी किया जा सकता है।

2003 में रुड़की में हुई थी वारदात
मामला वर्ष 2003 का है, जब रुड़की क्षेत्र में हत्या और लूट के प्रयास की घटना सामने आई थी। इस प्रकरण में सत्र न्यायालय ने आरोपी को दोषी ठहराते हुए आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी। वर्ष 2013 में हाईकोर्ट की खंडपीठ ने इस सजा को बरकरार रखा, जबकि बाद में उच्चतम न्यायालय ने भी इस फैसले की पुष्टि की थी।

जेल से भेजे गए प्रार्थनापत्र पर शुरू हुई जांच
हत्या के दोषी ने वर्ष 2021 में जेल से प्रार्थनापत्र भेजकर यह दावा किया कि घटना की तिथि 24 जून 2003 को वह नाबालिग था। इस दावे की सत्यता की जांच के लिए हाईकोर्ट ने रजिस्ट्रार ज्यूडिशियल को विस्तृत जांच के निर्देश दिए।

स्कूल रिकॉर्ड से सामने आई सच्चाई
जांच के दौरान स्कूल रिकॉर्ड, स्कॉलर रजिस्टर और गवाहों के बयानों की गहन पड़ताल की गई। रिपोर्ट में सामने आया कि आरोपी की वास्तविक जन्म तिथि 22 मई 1988 है। इस आधार पर यह स्पष्ट हुआ कि वारदात के समय उसकी उम्र लगभग 15 वर्ष 1 माह थी, जिससे वह कानूनन नाबालिग साबित हुआ।

दोषसिद्धि बरकरार, लेकिन सजा अमान्य
हाईकोर्ट ने रिपोर्ट को स्वीकार करते हुए कहा कि आरोपी घटना के समय नाबालिग था। अदालत ने यह भी माना कि वारदात में उसकी भूमिका अन्य सह-आरोपियों के समान थी, इसलिए दोषसिद्धि को बरकरार रखा गया। हालांकि, जुवेनाइल जस्टिस एक्ट के तहत किसी नाबालिग को न तो उम्रकैद जैसी सजा दी जा सकती है और न ही उसे तीन वर्ष से अधिक समय तक सुधार गृह में रखा जा सकता है।

तत्काल रिहाई के आदेश
कोर्ट ने कहा कि आरोपी पहले ही 13 साल से अधिक समय जेल में बिता चुका है, जो कानून में निर्धारित अवधि से कहीं अधिक है। इस आधार पर हाईकोर्ट ने उसकी तत्काल रिहाई का आदेश दिया। अदालत के इस फैसले को नाबालिगों के अधिकारों की सुरक्षा के लिहाज से एक महत्वपूर्ण और नजीर पेश करने वाला निर्णय माना जा रहा है।

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