हरिद्वार। उत्तराखंड के राजाजी टाइगर रिजर्व में वन्यजीव सुरक्षा व्यवस्था की संवेदनशीलता पर एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। यहां गंगा नदी के तट पर एक गंभीर रूप से घायल हाथी पूरे दिन दर्द से कराहता रहा, लेकिन उसके इलाज और रेस्क्यू को लेकर जिम्मेदार तंत्र की ओर से कोई ठोस और त्वरित कार्रवाई नहीं की गई।
यह मार्मिक दृश्य सोमवार को गौहरीमाफी क्षेत्र में बिरला मंदिर के समीप देखने को मिला। सुबह तड़के ग्रामीणों ने नदी किनारे हाथी को देखा, जिसके एक पैर में गहरी चोट थी। चोट इतनी गंभीर थी कि हाथी पैर घसीटते हुए मुश्किल से चल पा रहा था। कई बार चलते समय उसका संतुलन बिगड़ा और वह गिरते-गिरते बचा।
ग्रामीणों ने दी सूचना, वीडियो भी बनाया
हाथी की हालत देखकर स्थानीय ग्रामीणों ने तुरंत वन विभाग को सूचना दी। इस दौरान कुछ ग्रामीणों ने घायल हाथी का वीडियो भी बनाया, जो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है। वीडियो में हाथी दर्द से कराहता और बार-बार चिंघाड़ता नजर आ रहा है। स्थानीय लोगों का कहना है कि हाथी की चिंघाड़ में गुस्सा और पीड़ा साफ झलक रही थी, मानो वह मदद की गुहार लगा रहा हो।
पूरा दिन बीत गया, रेस्क्यू नहीं हुआ
सबसे गंभीर बात यह सामने आई कि दोनों ओर तैनात वनकर्मी घायल हाथी की मदद करने के बजाय उसे अपनी-अपनी सीमा में आने से रोकते रहे। जैसे ही हाथी किसी एक दिशा में बढ़ता, उसे खदेड़ दिया जाता। इसी खींचतान में पूरा दिन गुजर गया और घायल हाथी गंगा तट पर ही दर्द सहता खड़ा रहा।
स्थानीय लोगों का आरोप है कि इतने गंभीर मामले की सूचना समय पर उच्च अधिकारियों तक भी नहीं पहुंचाई गई। यदि तत्काल चिकित्सकीय सहायता और रेस्क्यू शुरू किया जाता, तो हाथी की पीड़ा को काफी हद तक कम किया जा सकता था।
एक सप्ताह से की जा रही मॉनीटरिंग का दावा
इस मामले में कोको रोशे, निदेशक, राजाजी टाइगर रिजर्व ने बताया कि इस हाथी की पिछले करीब एक सप्ताह से मॉनीटरिंग की जा रही है, ताकि वह आबादी क्षेत्र में प्रवेश न करे। उन्होंने कहा कि हाथी के उपचार के प्रयास किए जा रहे हैं और इस तरह के हाथी राजाजी पार्क क्षेत्र में अक्सर देखने को मिलते हैं।
हालांकि, मौके की स्थिति और स्थानीय लोगों के आरोप वन विभाग की कार्यप्रणाली और संवेदनशीलता पर सवाल खड़े कर रहे हैं। वन्यजीव विशेषज्ञों का मानना है कि घायल हाथी न केवल स्वयं के लिए बल्कि आसपास की आबादी के लिए भी खतरा बन सकता है। ऐसे में समय रहते रेस्क्यू और उपचार बेहद जरूरी है, ताकि वन्यजीव संरक्षण और जनसुरक्षा दोनों सुनिश्चित की जा सकें।