Wednesday, March 11, 2026
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उत्तराखंड में UCC संशोधन अध्यादेश लागू, पहचान छिपाकर शादी करने पर होगी जेल; लिव-इन संबंधों पर भी सख्त नियम

देहरादून: उत्तराखंड में समान नागरिक संहिता (UCC) को और अधिक प्रभावी और सख्त बनाने के लिए धामी सरकार ने बड़ा कदम उठाया है। राज्य में समान नागरिक संहिता, उत्तराखंड (संशोधन) अध्यादेश, 2026 लागू कर दिया गया है। बजट सत्र में पेश किए जाने के बाद राज्यपाल लेफ्टिनेंट जनरल गुरमीत सिंह (सेवानिवृत्त) की मंजूरी मिलते ही यह अध्यादेश प्रभावी हो गया है। इसके साथ ही प्रदेश में विवाह, पंजीकरण और लिव-इन रिलेशनशिप से जुड़े नियमों में कई अहम बदलाव लागू हो गए हैं।

नए प्रावधानों के अनुसार अब पहचान छिपाकर या गलत जानकारी देकर शादी करने वाले व्यक्तियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी। यदि विवाह के किसी भी पक्षकार ने अपनी पहचान, धर्म या वैवाहिक स्थिति के बारे में गलत जानकारी दी है तो ऐसे विवाह को शून्य घोषित किया जा सकता है। इसके साथ ही अपनी वास्तविक पहचान या पहले से विवाहित होने की जानकारी छिपाकर विवाह करने वाले व्यक्ति के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता के तहत दंडात्मक कार्रवाई की जाएगी और उसे जेल भी हो सकती है।

लिव-इन रिलेशनशिप के लिए सख्त प्रावधान

संशोधन अध्यादेश में लिव-इन रिलेशनशिप को लेकर भी कड़े नियम बनाए गए हैं। यदि कोई व्यक्ति बल, दबाव या धोखाधड़ी के माध्यम से किसी को लिव-इन संबंध में रहने के लिए मजबूर करता है, तो उसे सात साल तक की सजा और जुर्माना भुगतना पड़ सकता है।

इसके अलावा, खून के रिश्तों या प्रतिबंधित श्रेणी में आने वाले व्यक्तियों के बीच लिव-इन संबंध स्थापित करने पर भी सात साल तक के कारावास का प्रावधान किया गया है।

यदि कोई वयस्क व्यक्ति नाबालिग के साथ लिव-इन संबंध में रहता है, तो उसे छह माह तक की जेल और 50 हजार रुपये तक का जुर्माना लगाया जा सकता है।

संबंध समाप्त होने पर मिलेगा प्रमाण-पत्र

नए नियमों के तहत यदि लिव-इन संबंध समाप्त होता है, तो संबंधित निबंधक द्वारा दोनों पक्षों को निर्धारित प्रपत्र में प्रमाण-पत्र जारी किया जाएगा। इसके अलावा विवाह, तलाक या लिव-इन संबंध के पंजीकरण को निरस्त करने का अधिकार महानिबंधक को दिया गया है। हालांकि किसी भी पंजीकरण को रद्द करने से पहले संबंधित पक्ष को अपना पक्ष रखने और सुनवाई का पूरा अवसर दिया जाएगा।

सरकार का कहना है कि इन संशोधनों का उद्देश्य समान नागरिक संहिता को अधिक पारदर्शी, प्रभावी और दुरुपयोग से मुक्त बनाना है, ताकि विवाह और पारिवारिक संबंधों से जुड़े मामलों में स्पष्टता और जवाबदेही सुनिश्चित हो सके।

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