वाराणसी।
देश की प्राचीनतम नगरी काशी ने बीते 11 वर्षों में विकास की ऐसी यात्रा तय की है, जिसने न सिर्फ शहर की तस्वीर बदली है, बल्कि उसकी पहचान को भी नए सिरे से स्थापित किया है। आज जब सुबह की पहली ट्रेन वाराणसी जंक्शन पर पहुंचती है, तो प्लेटफॉर्म पर उतरते यात्रियों की आंखों में उत्सुकता और आश्चर्य साफ दिखाई देता है। यह वही काशी है, लेकिन सुविधाओं, व्यवस्थाओं और आत्मविश्वास के स्तर पर अब बिल्कुल अलग नजर आती है।
करीब एक दशक पहले तक काशी की गलियां संकरी थीं, दर्शन की प्रक्रिया कठिन थी और सीमित संख्या में श्रद्धालु ही यहां पहुंच पाते थे। एक दिन में 20 से 25 हजार श्रद्धालुओं के आने पर ही शहर की व्यवस्थाओं पर दबाव दिखने लगता था। अब हालात पूरी तरह बदल चुके हैं। वर्तमान में काशी रोजाना औसतन सवा लाख से डेढ़ लाख श्रद्धालुओं को संभाल रही है। सावन, महाशिवरात्रि और अन्य बड़े पर्वों पर यह संख्या छह से 10 लाख तक पहुंच जाती है। बीते एक साल में ही 11 करोड़ से अधिक श्रद्धालु बाबा विश्वनाथ के दर्शन के लिए काशी पहुंचे हैं।
55 हजार करोड़ की योजनाओं से बदला शहर का स्वरूप
पिछले 11 वर्षों में काशी के विकास के लिए 55 हजार करोड़ रुपये से अधिक की परियोजनाएं स्वीकृत की गईं। इनमें से करीब 36 हजार करोड़ रुपये की परियोजनाएं पूरी हो चुकी हैं या धरातल पर आकार ले चुकी हैं। सड़कों का चौड़ीकरण, घाटों का सौंदर्यीकरण, बेहतर कनेक्टिविटी और आधुनिक दर्शन व्यवस्था ने काशी को एक सुव्यवस्थित धार्मिक-पर्यटन केंद्र में बदल दिया है।
काशी विश्वनाथ कॉरिडोर से बढ़ा रोजगार
काशी विश्वनाथ कॉरिडोर परियोजना ने शहर के सामाजिक और आर्थिक जीवन में बड़ा बदलाव किया है। इस परियोजना से स्थानीय दुकानदारों, नाविकों, पुरोहितों और पर्यटन से जुड़े लोगों को स्थायी और सम्मानजनक रोजगार मिला है। फूल-प्रसाद बेचने वाले, होटल कर्मचारी, नाविक और गाइड—हजारों परिवारों की आजीविका सीधे तौर पर इस विकास से जुड़ गई है।
अर्थव्यवस्था में अहम योगदान
आंकड़ों के मुताबिक, काशी ने हाल के वर्षों में देश की अर्थव्यवस्था में करीब 1.3 लाख करोड़ रुपये का योगदान दिया है। यह योगदान सिर्फ पर्यटन आय तक सीमित नहीं है, बल्कि इससे जुड़े रोजगार, सेवाएं, परिवहन और स्थानीय व्यापार की पूरी श्रृंखला को मजबूती मिली है। घाटों पर काम करने वाले नाविकों का कहना है कि पहले आमदनी अनिश्चित रहती थी, जबकि अब श्रद्धालुओं और पर्यटकों की लगातार आवाजाही से आय स्थिर हो गई है।
विकास के बीच सुरक्षित रही काशी की आत्मा
तेजी से हुए विकास के बावजूद काशी ने अपनी सांस्कृतिक और आध्यात्मिक आत्मा को बनाए रखा है। सुबह की आरती, शाम की गंगा आरती और गलियों में बसी परंपरागत खुशबू आज भी काशी की पहचान है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा काशी को ‘आत्मा’ कहे जाने का भाव यहां के विकास मॉडल में साफ झलकता है, जहां आस्था और आधुनिकता के बीच संतुलन बनाया गया है।
कुल मिलाकर, बीते 11 वर्षों में काशी ने श्रद्धा के केंद्र से आगे बढ़कर एक सशक्त आर्थिक और सांस्कृतिक शक्ति के रूप में खुद को स्थापित किया है। यह बदलाव काशी की नई पहचान बन चुका है, जो परंपरा और विकास—दोनों को साथ लेकर आगे बढ़ रही है।