Saturday, October 24, 2026
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देहदान की अनूठी मिसाल: एम्स ऋषिकेश में आठ दिन की मृत नवजात का देहदान, माता-पिता के फैसले ने पेश की मानवता की मिसाल

ऋषिकेश/चमोली।
दुख की सबसे गहरी घड़ी में भी मानवता और समाजहित को सर्वोपरि रखने का भाव यदि जीवित रहे, तो वही सच्ची संवेदना है। ऐसी ही एक मार्मिक और प्रेरक घटना अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) ऋषिकेश में सामने आई है, जहां चमोली जिले के एक दंपती ने अपनी मात्र आठ दिन की मृत नवजात बच्ची का देहदान कर समाज के सामने एक मिसाल पेश की है।

चमोली निवासी हंसी देवी पत्नी संदीप राम ने बीते 2 जनवरी को मेडिकल कॉलेज श्रीनगर में एक बच्ची को जन्म दिया था। जन्म के बाद चिकित्सकीय जांच में सामने आया कि नवजात की आंतों में तंत्रिका गुच्छों (गैंग्लिया) का अभाव है, जो एक गंभीर जन्मजात रोग है। शिशु की हालत लगातार बिगड़ने पर 4 जनवरी को उसे एम्स ऋषिकेश रेफर किया गया।

एम्स में विशेषज्ञ चिकित्सकों द्वारा नवजात का ऑपरेशन किया गया, लेकिन तमाम चिकित्सकीय प्रयासों के बावजूद रविवार को रिफ्रैक्टरी सेप्टिक शॉक के कारण बच्ची की मृत्यु हो गई। इस असहनीय क्षति से परिवार पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा।

दुख में भी दिखाया बड़ा दिल
एम्स के नर्सिंग स्टाफ ने इस दौरान मृत नवजात के परिजनों का संपर्क मोहन फाउंडेशन, उत्तराखंड के प्रोजेक्ट लीडर संचित अरोड़ा से कराया। संचित अरोड़ा ने नेत्रदान कार्यकर्ता एवं लायंस क्लब ऋषिकेश देवभूमि के चार्टर अध्यक्ष गोपाल नारंग के साथ परिजनों से मुलाकात की और संवेदनशीलता के साथ देहदान के महत्व की जानकारी दी।

गहरे शोक के बावजूद परिजनों ने एक साहसिक और मानवीय निर्णय लेते हुए नवजात के देहदान के लिए सहमति दे दी। इसके बाद एम्स ऋषिकेश के एनाटॉमी विभाग से संपर्क कर सभी औपचारिकताएं पूरी की गईं और मृत नवजात की देह चिकित्सा शिक्षा एवं शोध के लिए विभाग को सौंप दी गई। संचित अरोड़ा इससे पूर्व भी दो देहदान की प्रक्रिया सफलतापूर्वक संपन्न करा चुके हैं।

एम्स ऋषिकेश के जनसंपर्क अधिकारी डॉ. श्रीलॉय मोहंती ने बताया कि इलाज के दौरान आठ दिन की नवजात की मृत्यु हुई थी, जिसके बाद परिजनों ने मेडिकल छात्रों के अध्ययन और शोध के उद्देश्य से देहदान किया है।

“हमारे बच्चे की मौत किसी और के जीवन की रोशनी बने”
नवजात के पिता संदीप राम ने भावुक शब्दों में कहा कि उनकी बेटी जन्म से ही गंभीर बीमारी से जूझ रही थी। “हम उसे बचा नहीं पाए, यह हमारे जीवन का सबसे बड़ा दुख है। लेकिन हमने सोचा कि अगर हमारे बच्चे का शरीर मेडिकल छात्रों के काम आ सके और भविष्य में किसी और बच्चे की जान बचा सके, तो यही उसके लिए सच्ची श्रद्धांजलि होगी।”

उन्होंने कहा कि इस कठिन निर्णय के पीछे एक ही भावना थी कि उनकी बच्ची भले ही इस दुनिया में न रह सकी, लेकिन उसका योगदान किसी और के जीवन के लिए उम्मीद की किरण बने। यह घटना समाज को यह संदेश देती है कि मृत्यु के बाद भी इंसान अपने कर्मों से अमर हो सकता है।

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