आगरा (उत्तर प्रदेश)।
उत्तर प्रदेश के आगरा जिले से न्याय व्यवस्था को झकझोर देने वाला मामला सामने आया है, जहां पुलिस की एक गंभीर गलती के कारण एक निर्दोष बुजुर्ग किसान को 12 वर्षों तक अदालतों के चक्कर काटने पड़े। नाम की समानता के चलते पुलिस ने गलत व्यक्ति को आरोपी बना दिया, जबकि असली आरोपी कोई और था। आखिरकार विशेष न्यायाधीश आर्थिक अपराध न्यायालय ने निर्दोष किसान को बरी कर दिया।
मामला थाना अछनेरा क्षेत्र के गांव साही निवासी 73 वर्षीय तुहीराम पुत्र मोहन सिंह से जुड़ा है। पुलिस ने तुहीराम पुत्र मोनाराम की जगह तुहीराम पुत्र मोहन सिंह को आरोपी बना दिया। दोनों का नाम एक होने के कारण यह चूक हुई, जिसका खामियाजा निर्दोष बुजुर्ग को वर्षों तक भुगतना पड़ा।
बिजली चोरी के आरोप में दर्ज हुआ था मुकदमा
थाना अछनेरा में दर्ज मुकदमे के अनुसार, विद्युत विभाग के अवर अभियंता ने 29 नवंबर 2012 को तहरीर दी थी। तहरीर में बताया गया कि 22 नवंबर 2012 को गांव साही में बिजली बिल का भुगतान न होने पर कुछ ग्रामीणों के बिजली कनेक्शन काट दिए गए थे। इसके बावजूद कटिया डालकर बिजली चोरी की जा रही थी।
29 नवंबर 2012 को जांच के दौरान विद्युत विभाग की टीम ने कुछ लोगों को बिजली चोरी करते हुए पकड़ा। इस पर विद्युत अधिनियम की धारा 138(बी) के तहत मुकदमा दर्ज किया गया। पुलिस ने विवेचना के बाद पांच आरोपियों के खिलाफ आरोप पत्र भी अदालत में दाखिल कर दिया।
असल आरोपी की जगह निर्दोष को भेज दिया कटघरे में
जांच में सामने आया कि विद्युत विभाग की टीम ने मौके से तुहीराम पुत्र मोनाराम को पकड़ा था, लेकिन पुलिस ने गलती से आरोप पत्र में तुहीराम पुत्र मोहन सिंह का नाम दर्ज कर दिया। इस लापरवाही के चलते निर्दोष बुजुर्ग पर बिजली चोरी का मुकदमा चलने लगा।
2014 में जब अदालत से नोटिस उनके घर पहुंचा तो उनके होश उड़ गए। खुद को बेगुनाह साबित करने के लिए उन्होंने पुलिस, विद्युत विभाग और प्रशासनिक अधिकारियों के कार्यालयों के चक्कर लगाए, लेकिन कहीं कोई सुनवाई नहीं हुई।
बुढ़ापे में झेली बदनामी और आर्थिक नुकसान
तुहीराम ने बताया कि उन्होंने वर्ष 2007 में ही अपने नाम का बिजली कनेक्शन कटवा दिया था और अपने बेटे कृष्णा के नाम से नया कनेक्शन ले लिया था। उनके नाम पर किसी तरह का कोई बिजली बिल बकाया नहीं था। इसके बावजूद उन्हें बिजली चोरी के मामले में आरोपी बना दिया गया।
मुकदमे के कारण गांव में उनकी सामाजिक प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचा। 12 वर्षों तक अदालतों के चक्कर लगाते-लगाते उनके लाखों रुपये खर्च हो गए और मानसिक पीड़ा अलग से झेलनी पड़ी।
अदालत ने किया बरी, लेकिन सवाल कायम
विशेष न्यायाधीश आर्थिक अपराध ज्ञानेंद्र राव ने सभी तथ्यों और साक्ष्यों के आधार पर तुहीराम पुत्र मोहन सिंह को निर्दोष मानते हुए बरी कर दिया। अदालत ने अपने आदेश में यह भी कहा कि विद्युत विभाग असली आरोपी के खिलाफ कार्रवाई करने के लिए स्वतंत्र है।
हालांकि अदालत से राहत मिलने के बाद भी यह सवाल बना हुआ है कि क्या कोई उस बुजुर्ग के खोए हुए 12 साल, खर्च हुई रकम और बदनामी की भरपाई कर सकता है। यह मामला पुलिस की लापरवाही और व्यवस्था की संवेदनहीनता का जीता-जागता उदाहरण बन गया है।