Thursday, March 12, 2026
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विश्व किडनी दिवस: किडनी ट्रांसप्लांट से मरीजों को नई जिंदगी की उम्मीद, अंगदान के प्रति जागरूकता बढ़ाने पर जोर

विश्व किडनी दिवस: किडनी ट्रांसप्लांट से मरीजों को नई जिंदगी की उम्मीद, अंगदान के प्रति जागरूकता बढ़ाने पर जोर

देहरादून। विश्व किडनी दिवस के अवसर पर विशेषज्ञों ने कहा कि किडनी प्रत्यारोपण (ट्रांसप्लांट) गंभीर गुर्दा रोग से जूझ रहे मरीजों के लिए नई जिंदगी की सबसे बड़ी उम्मीद बनकर उभर रहा है। समय पर इलाज और अंगदान के प्रति जागरूकता बढ़ाकर हजारों मरीजों को जीवनदान दिया जा सकता है।

आधुनिक चिकित्सा विज्ञान ने कई गंभीर बीमारियों के उपचार के नए रास्ते खोले हैं, जिनमें किडनी प्रत्यारोपण भी शामिल है। यह उन मरीजों के लिए उम्मीद की किरण साबित होता है जिनके गुर्दे स्थायी रूप से काम करना बंद कर देते हैं। एम्स के विशेषज्ञों का कहना है कि यदि मरीज समय रहते उपचार कराएं और समाज में अंगदान के प्रति जागरूकता बढ़े, तो बड़ी संख्या में मरीजों को नई जिंदगी मिल सकती है।

एम्स के गुर्दारोग विभाग की एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. शेरोन कंडारी ने बताया कि मानव शरीर में गुर्दे अत्यंत महत्वपूर्ण अंग हैं। गुर्दे रक्त को साफ करने, शरीर से अतिरिक्त पानी और विषैले तत्वों को बाहर निकालने, रक्तचाप को नियंत्रित रखने और शरीर में इलेक्ट्रोलाइट संतुलन बनाए रखने का काम करते हैं।

उन्होंने बताया कि जब किसी कारण से गुर्दों की कार्यक्षमता 10 से 15 प्रतिशत से कम रह जाती है, तो मरीज को डायलिसिस या किडनी प्रत्यारोपण की जरूरत पड़ती है। डायलिसिस को अस्थायी उपचार माना जाता है, जबकि किडनी ट्रांसप्लांट गुर्दा विफलता का सबसे प्रभावी और स्थायी इलाज है। सफल प्रत्यारोपण के बाद मरीज सामान्य जीवन के काफी करीब जीवन जी सकता है और उसकी जीवन गुणवत्ता में भी काफी सुधार होता है।

तीन से चार घंटे तक चलती है सर्जरी

किडनी प्रत्यारोपण से पहले मरीज और अंगदाता दोनों की विस्तृत चिकित्सकीय जांच की जाती है। ऑपरेशन के दौरान दाता की किडनी निकालकर मरीज के शरीर के निचले पेट के हिस्से में प्रत्यारोपित की जाती है। आमतौर पर मरीज के पुराने गुर्दों को नहीं निकाला जाता। पूरी सर्जरी लगभग तीन से चार घंटे तक चलती है। ऑपरेशन के लगभग एक सप्ताह बाद मरीज को अस्पताल से छुट्टी दे दी जाती है।

पंजीकरण की सुविधा हर कार्यदिवस पर

डॉ. शेरोन कंडारी ने बताया कि किडनी ट्रांसप्लांट के लिए एम्स के गुर्दारोग विभाग में पंजीकरण की सुविधा शनिवार को छोड़कर सभी कार्यदिवसों में उपलब्ध है। यहां ट्रांसप्लांट से संबंधित ओपीडी सप्ताह में तीन दिन—सोमवार, मंगलवार और बृहस्पतिवार को आयोजित की जाती है।

पंजीकरण के लिए मरीज को पहचान प्रमाण, निवास प्रमाण, मेडिकल रिकॉर्ड और डोनर की जानकारी अस्पताल में जमा करनी होती है। यदि मरीज के पास जीवित दाता उपलब्ध नहीं है, तो वह मृत दाता (कैडेवर) के लिए प्रतीक्षा सूची में शामिल होने के लिए सरकारी पोर्टल या अस्पताल के माध्यम से आवेदन कर सकता है।

अब तक 22 मरीजों का हुआ सफल प्रत्यारोपण

एम्स को रीजनल ऑर्गन एंड टिश्यू ट्रांसप्लांट ऑर्गनाइजेशन से आठ जनवरी 2021 को किडनी ट्रांसप्लांट की अनुमति मिली थी। इसके बाद अप्रैल 2023 में यहां पहली बार सफल किडनी प्रत्यारोपण किया गया।

डॉ. कंडारी के अनुसार अब तक 22 मरीजों में सफल किडनी प्रत्यारोपण किया जा चुका है। वहीं 111 मरीजों की ट्रांसप्लांट प्रक्रिया चल रही है और इनके पास अंगदाता उपलब्ध हैं। इसके अलावा लगभग 50 मरीज ऐसे हैं जो मृत दाता से किडनी मिलने की प्रतीक्षा सूची में शामिल हैं।

अंगदान के प्रति जागरूकता की कमी

विशेषज्ञों का कहना है कि भारत में अंगदान के प्रति जागरूकता की कमी एक बड़ी चुनौती है। इसके कारण बड़ी संख्या में जरूरतमंद मरीजों को समय पर अंगदाता नहीं मिल पाते। वर्तमान में केवल लगभग 10 प्रतिशत मरीजों को ही किडनी प्रत्यारोपण के लिए अंग मिल पाता है, जबकि करीब 90 प्रतिशत मरीज इससे वंचित रह जाते हैं।

सामाजिक कार्यकर्ताओं और चिकित्सकों का मानना है कि अंगदान के महत्व को स्कूली पाठ्यक्रम में शामिल किया जाना चाहिए, ताकि बच्चों में बचपन से ही इसके प्रति जागरूकता विकसित हो सके।

आंकड़ों के अनुसार स्पेन में मस्तिष्क मृत मरीजों से अंगदान की दर विश्व में सबसे अधिक है, जहां प्रति दस लाख आबादी पर 33 लोग अंगदान करते हैं। इसके मुकाबले भारत में यह दर बेहद कम है और प्रति दस लाख आबादी पर लगभग 0.05 ही है, यानी सालाना करीब 50 मृत शरीर दाता ही उपलब्ध हो पाते हैं।

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