Sunday, January 11, 2026
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POCSO कानून में ‘रोमियो-जूलियट प्रावधान’ की जरूरत क्यों? सुप्रीम कोर्ट ने दुरुपयोग पर जताई चिंता

नई दिल्ली।
यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण अधिनियम (POCSO Act) के दुरुपयोग को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने गंभीर चिंता जताई है। शीर्ष अदालत ने कहा है कि सहमति से बने वास्तविक किशोर प्रेम संबंधों को अपराध की श्रेणी में रखना कानून के मूल उद्देश्य के विपरीत है। इसी को ध्यान में रखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को कानून में ‘रोमियो-जूलियट प्रावधान’ जोड़ने पर विचार करने का सुझाव दिया है।

शुक्रवार को जस्टिस संजय करोल और जस्टिस एन. कोटेश्वर सिंह की पीठ ने POCSO कानून के व्यापक दुरुपयोग पर संज्ञान लिया। अदालत ने कहा कि कई मामलों में इस कानून का इस्तेमाल निजी दुश्मनी, बदले या व्यक्तिगत विवाद निपटाने के लिए किया जा रहा है, जिससे कानून की पवित्रता प्रभावित हो रही है।

केंद्र सरकार को क्या सुझाव दिया

सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया कि इस फैसले की एक प्रति भारत सरकार के विधि सचिव को भेजी जाए, ताकि POCSO कानून के दुरुपयोग को रोकने के लिए आवश्यक कदमों पर विचार किया जा सके। कोर्ट ने कहा कि वास्तविक किशोर प्रेम संबंधों को कानून के दायरे से बाहर रखने के लिए ‘रोमियो-जूलियट प्रावधान’ जोड़ना जरूरी हो सकता है। इसके साथ ही ऐसे लोगों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की व्यवस्था भी होनी चाहिए, जो इस कानून का गलत इस्तेमाल करते हैं।

हालांकि, पीठ ने यह भी स्पष्ट किया कि POCSO कानून न्याय की सबसे पवित्र अभिव्यक्तियों में से एक है, जिसका उद्देश्य बच्चों को यौन अपराधों से सुरक्षा प्रदान करना है।

हाईकोर्ट के आदेश पर सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी

इलाहाबाद हाईकोर्ट के एक आदेश को रद्द करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जमानत के दौरान पीड़ित की उम्र का अनिवार्य मेडिकल परीक्षण कराने का निर्देश देना दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 439 के तहत हाईकोर्ट के अधिकार क्षेत्र से बाहर है। अदालत ने कहा कि जमानत याचिका पर सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ‘मिनी ट्रायल’ नहीं चला सकता और न ही ऐसे निर्देश दे सकता है, जो मौजूदा कानूनों के अनुरूप न हों।

सबूतों से छेड़छाड़ को लेकर चिंता

एक अन्य मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि बच्चों के खिलाफ यौन अपराधों से जुड़े मामलों में जमानत मिलने के बाद सबूतों से छेड़छाड़ या गवाहों को प्रभावित किए जाने की आशंका गंभीर चिंता का विषय है।

जस्टिस बी. वी. नागरत्ना और जस्टिस आर. महादेवन की पीठ ने उत्तर प्रदेश के शामली जिले के एक मामले में आरोपी को दी गई जमानत को रद्द करते हुए कहा कि पीड़ित की सुरक्षा और न्याय प्रक्रिया की शुचिता सर्वोपरि है।

जमानत पर सुप्रीम कोर्ट का रुख

शीर्ष अदालत ने दोहराया कि जमानत याचिका पर फैसला करते समय अदालतों को अपराध की प्रकृति, उसकी गंभीरता और जांच के दौरान जुटाए गए साक्ष्यों को ध्यान में रखना चाहिए। कोर्ट ने कहा कि जमानत न तो केवल तकनीकी आधार पर खारिज की जानी चाहिए और न ही महत्वपूर्ण साक्ष्यों की अनदेखी कर दी जानी चाहिए।

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