आंध्र प्रदेश के जनजातीय क्षेत्र में स्थित अराकू घाटी आज देश-दुनिया में अपनी विशिष्ट पहचान बना रही है। यहां की विश्वस्तरीय अरेबिका कॉफी न केवल अपनी सुगंध और गुणवत्ता के लिए प्रसिद्ध है, बल्कि इसने हजारों आदिवासी परिवारों की आर्थिक तस्वीर भी बदल दी है।
अराकू घाटी भारत का एकमात्र ऐसा कॉफी उत्पादन क्षेत्र माना जाता है, जहां खेती से लेकर प्रसंस्करण तक का पूरा कार्य आदिवासी समुदाय द्वारा किया जाता है। इस क्षेत्र में 13 प्रमुख जनजातियां निवास करती हैं और शत-प्रतिशत परिवार किसी न किसी रूप में कॉफी उत्पादन से जुड़े हुए हैं। विशेष रूप से आदिम जनजातीय समूह (पीटीजी) की भागीदारी इस मॉडल को और भी विशिष्ट बनाती है।
यहां उत्पादित कॉफी पूरी तरह प्राकृतिक और जैविक पद्धति से उगाई जाती है। अराकू की अरेबिका कॉफी को जीआई टैग भी प्राप्त है, जिससे इसकी गुणवत्ता और विशिष्टता को आधिकारिक मान्यता मिली है। यूरोप सहित कई देशों में इसकी मांग तेजी से बढ़ी है और नियमित रूप से निर्यात किया जा रहा है।
कॉफी उत्पादकों को तकनीकी प्रशिक्षण, उन्नत बीज, जैविक खेती की जानकारी और विपणन सहायता कॉफी बोर्ड द्वारा प्रदान की जा रही है। यह बोर्ड वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय के अधीन कार्य करता है और उत्पादन से लेकर ब्रांडिंग तक हर स्तर पर सहयोग दे रहा है।
2.58 लाख एकड़ में हो रही खेती
वर्तमान में घाटी के लगभग 1.30 लाख आदिवासी परिवार कॉफी उत्पादन से जुड़े हैं। करीब 2.58 लाख एकड़ भूमि पर कॉफी की खेती की जा रही है। आने वाले समय में एक लाख एकड़ अतिरिक्त क्षेत्र में विस्तार की योजना भी बनाई गई है। विशेषज्ञों का मानना है कि अराकू घाटी की जलवायु कॉफी उत्पादन के लिए बेहद अनुकूल है, जिससे यहां की उपज की गुणवत्ता उत्कृष्ट बनी रहती है।
कॉफी बोर्ड के वरिष्ठ अधिकारियों के अनुसार, आधुनिक कृषि तकनीकों, वैज्ञानिक विधियों और बेहतर प्रसंस्करण सुविधाओं के जरिए कॉफी की गुणवत्ता में निरंतर सुधार किया जा रहा है।
आय में उल्लेखनीय वृद्धि
कॉफी उत्पादन से जुड़े परिवार एक एकड़ भूमि से सालाना 50 हजार रुपये से लेकर 3.50 लाख रुपये तक की आय अर्जित कर रहे हैं। इससे आदिवासी समुदाय के जीवन स्तर में सुधार हुआ है और शिक्षा व स्वास्थ्य सुविधाओं तक उनकी पहुंच बढ़ी है।
केंद्र सरकार द्वारा वित्तीय सहायता, बाजार संपर्क और ब्रांडिंग सपोर्ट मिलने से अराकू घाटी की कॉफी अब एक मजबूत वैश्विक ब्रांड के रूप में उभर रही है। अराकू का यह मॉडल आदिवासी सशक्तिकरण और आत्मनिर्भर भारत की दिशा में एक सफल उदाहरण बनता जा रहा है।