Friday, May 22, 2026
Homeउत्तराखंडअंतरराष्ट्रीय चाय दिवस: उत्तराखंड बन रहा चाय उत्पादन का नया हब, नौ...

अंतरराष्ट्रीय चाय दिवस: उत्तराखंड बन रहा चाय उत्पादन का नया हब, नौ जिलों में लहलहा रहे बागान

अंतरराष्ट्रीय चाय दिवस के अवसर पर उत्तराखंड की चाय उद्योग से जुड़ी तस्वीर तेजी से बदलती दिखाई दे रही है। कभी केवल पर्यटन और प्राकृतिक सौंदर्य के लिए पहचाने जाने वाला उत्तराखंड अब देश के प्रमुख चाय उत्पादक राज्यों में अपनी मजबूत पहचान बनाने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। दार्जिलिंग और असम जैसी पारंपरिक चाय बेल्ट के बीच उत्तराखंड की चाय अपनी गुणवत्ता, स्वाद और जैविक उत्पादन के कारण तेजी से लोकप्रिय हो रही है।

राज्य के 13 जिलों में से नौ जिलों में वर्तमान में चाय का उत्पादन किया जा रहा है। हर वर्ष लगभग 1500 हेक्टेयर क्षेत्रफल में करीब सात लाख किलो हरी चाय पत्तियों का उत्पादन हो रहा है, जिससे लगभग 1.5 लाख किलो पीने योग्य चाय तैयार की जाती है। उत्तराखंड चाय विकास बोर्ड अब इस उत्पादन को बढ़ाकर 8.5 लाख किलो हरी पत्तियों तक पहुंचाने की योजना बना रहा है। माना जा रहा है कि इससे राज्य के राजस्व में उल्लेखनीय वृद्धि होगी और ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार के नए अवसर पैदा होंगे।

किसानों को चाय उत्पादन के लिए किया जा रहा प्रोत्साहित

उत्तराखंड चाय विकास बोर्ड राज्य में चाय उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए लगातार किसानों को प्रोत्साहित कर रहा है। बोर्ड किसानों को अपनी भूमि पर स्वयं चाय उत्पादन करने के लिए प्रेरित कर रहा है और उनसे हरी चाय पत्तियां खरीद रहा है। वर्तमान में कुछ किसान निजी स्तर पर चाय की खेती कर रहे हैं और बोर्ड उनकी पत्तियों को 40 रुपये प्रति किलो की दर से खरीद रहा है। इससे किसानों को बेहतर आर्थिक लाभ मिल रहा है।

चाय उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए बोर्ड ने राज्य में पांच प्रोसेसिंग फैक्ट्रियां भी स्थापित की हैं। ये फैक्ट्रियां श्यामखेत (घोड़ाखाल), हरी नगरी (बागेश्वर), कौसानी, चंपावत और भटौली (चमोली) में संचालित हो रही हैं। इन फैक्ट्रियों में हरी पत्तियों को प्रोसेस कर उच्च गुणवत्ता वाली चाय तैयार की जाती है।

नैनीताल में मृदा परीक्षण केंद्र की स्थापना

चाय उत्पादन की गुणवत्ता बढ़ाने के लिए नैनीताल में एक मृदा परीक्षण केंद्र भी स्थापित किया गया है। यहां किसान अपनी भूमि की मिट्टी की जांच कर यह जानकारी प्राप्त कर सकते हैं कि उनकी जमीन चाय उत्पादन के लिए कितनी उपयुक्त है। इससे किसानों को वैज्ञानिक तरीके से खेती करने में सहायता मिल रही है।

हालांकि उत्तराखंड चाय विकास बोर्ड इस समय घाटे से जूझ रहा है। श्रमिकों के भुगतान और उत्पादन लागत को देखते हुए बोर्ड पर आर्थिक दबाव बना हुआ है। इसे कम करने के लिए सरकार की सहायता से चाय बागानों के कार्यों को विभिन्न सरकारी योजनाओं से जोड़ने की दिशा में प्रयास किए जा रहे हैं।

उत्तराखंड की चाय गुणवत्ता में किसी से कम नहीं

उत्तराखंड चाय विकास बोर्ड के निदेशक महेंद्र पाल सिंह का कहना है कि राज्य में उत्पादित चाय गुणवत्ता और स्वाद के मामले में देश की किसी भी प्रसिद्ध चाय से कम नहीं है। उन्होंने कहा कि उत्तराखंड की चाय अपनी ताजगी और विशिष्ट स्वाद के कारण लोगों के बीच लोकप्रिय हो रही है। आने वाले समय में टी टूरिज्म को बढ़ावा मिलने से किसानों की आर्थिक स्थिति और मजबूत होगी।

चार हजार परिवारों को मिल रहा रोजगार

राज्य में लगभग चार हजार परिवार सीधे तौर पर चाय की खेती से जुड़े हुए हैं। चाय उद्योग के माध्यम से हर वर्ष करीब सात लाख मानव दिवस रोजगार का सृजन हो रहा है। इसमें लगभग 80 प्रतिशत भागीदारी महिलाओं की है। महिलाएं खेत तैयार करने से लेकर चाय पत्तियों की तुड़ाई तक महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं।

कई किसान अपनी भूमि को 15 वर्षों के लिए चाय विकास बोर्ड को लीज पर देते हैं और बाद में उसी भूमि पर कार्य कर मजदूरी भी प्राप्त करते हैं। इससे किसानों को दोहरा आर्थिक लाभ मिलता है। अब बोर्ड किसानों को स्वयं चाय उत्पादन के लिए तैयार कर रहा है ताकि वे स्वतंत्र रूप से इस व्यवसाय को संचालित कर सकें।

कोलकाता मंडी तक पहुंच रही उत्तराखंड की चाय

उत्तराखंड में उत्पादित चाय की स्थानीय स्तर पर अभी सीमित खपत हो रही है। हालांकि राज्य के होटल और पर्यटन उद्योग स्थानीय चाय को पर्यटकों के सामने बेहतर तरीके से प्रस्तुत कर रहे हैं, जिससे इसकी लोकप्रियता बढ़ रही है। राज्य की अधिकांश चाय कोलकाता की थोक मंडियों में भेजी जा रही है, जहां देश-विदेश के खरीदार इसे खरीद रहे हैं।

बताया जा रहा है कि कई बड़ी चाय कंपनियां उत्तराखंड की चाय खरीदकर अपने ब्रांड नाम से बाजार में बेच रही हैं। ऐसे में उत्तराखंड की चाय धीरे-धीरे राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय बाजार में अपनी जगह बना रही है।

जैविक चाय की बढ़ती मांग से किसानों को फायदा

पूरी दुनिया में जैविक और ऑर्गेनिक खेती की मांग तेजी से बढ़ रही है और उत्तराखंड की चाय भी इसी दिशा में आगे बढ़ रही है। वर्तमान में राज्य में लगभग 450 हेक्टेयर क्षेत्र में जैविक चाय का उत्पादन किया जा रहा है। जैविक खेती का दायरा लगातार बढ़ाया जा रहा है।

विशेषज्ञों का मानना है कि ग्रीन टी और ऑर्गेनिक चाय की बढ़ती मांग उत्तराखंड के किसानों के लिए बड़ा अवसर बन सकती है। जैविक चाय को बाजार में पारंपरिक चाय की तुलना में बेहतर दाम और अच्छे खरीदार मिल रहे हैं, जिससे किसानों की आय में वृद्धि हो रही है।

RELATED ARTICLES

Most Popular

Recent Comments